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संगीत शिक्षकों की समक्ष उत्पन्न भ्रम की स्थिति का निवारण हो सके:राजा

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जिम्मेदार पदों पर आसीन पदाधिकारियों को कोई बयान या आदेश निर्देश जारी करने के पहले संबंधित विषय में उपलब्ध प्रतिवेदन व अभिलेखों का अध्ययन कर लेना चाहिए। संगीत शिक्षको और उनके डिप्लोमा पर झारखंड शिक्षा निदेशालय का हालिया बयान निःसंदेह उनमें अध्ययनशीलता के अभाव का परिणाम है। जिले के बैनी स्थित जगमोहन विद्यापति कॉलेज ऑफ आर्ट एंड टेक्नलॉजी के संस्थापक सचिव संजय कुमार राजा ने उक्त बातें मीडिया कर्मीयों से कहीं। वे पिछले दिनों पिछले दिनों झारखंड के अखबारों में संगीत शिक्षकों की बहाली को लेकर शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रयाग संगीत समिति एवं प्राचीन कला केंद्र चंडीगढ़ द्वारा प्रदत्त संगीत की डिग्रियों को फर्जी बताने वाली खबरों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना करार देते हुए कहा कि मीडिया में आई इस तरह की खबरें भ्रामक है। पिछले दिनों शिक्षा निदेशालय के हवाले से छपी खबर में प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद व प्राचीन कला केन्द्र , चंडीगढ़ दोनों संस्थानों द्वारा निर्गत डिप्लोमा डिग्री को फर्जी करार देने का कारण बताते हुए कहा गया है कि इन का नाम यूजीसी द्वारा निर्गत विश्व विद्यालयों की सूची में नहीं है। श्री राजा ने इस कथन को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि न तो पदाधिकारियों ने यूजीसी की गाइड लाइन का अध्ययन किया है ना ही इन पदाधिकारियों को यह पता है कि देश में कितने प्रकार की शिक्षण प्रशिक्षण संस्थाएं है। उन्होंने कहा कि 50 वर्षों से अधिक समय से संगीत व कला शिक्षण प्रशिक्षण, संरक्षण व संवर्धन हेतु समर्पित विश्व प्रसिद्ध इन दोनों संस्थानों से संगीत शिक्षा की डिग्री प्राप्त करवाले हजारों लोग केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय , रेलवे द्वारा संचालित विद्यालयों के साथ ही विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा संचालित विद्यालयों व महाविद्यालयों, विश्व विद्यालयों व विभिन्न पब्लिक स्कूलों में दशकों से संगीत शिक्षक के रुप में सेवा दे रहे हैं। यूजीसी के गाइड लाइन के अनुसार ही इन संस्थानों द्वारा प्रदत्त डिग्रियों के आधार पर इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, राजा मान सिंह तोमर संगीत विश्वविद्यालय, ग्वालियर के साथ ही बिहार के कई विश्वविद्यालयों में संगीत के उच्च शिक्षा हेतु नामांकन व नियुक्तियां वर्षों से होती अा रही है। यूजीसी ने इन संस्थानों के प्रमाण पत्र की विश्वसनीयता पर सहमति जताई है, इसी आलोक में एक मामले की सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इन दोनों संस्थानों द्वारा प्रदत्त डिप्लोमा एवं डिग्री को प्रामाणिक माना। आज अचानक इन संस्थाओं की डिग्रियों को फर्जी बताना बेशक भ्रम पैदा करने वाला है। गौरतलब है कि 6 फरवरी 2012 को झारखंड सरकार द्वारा प्रकाशित झारखंड गजट में भी इन संस्थानों की डिग्रियों को मान्यता दी गयी है। श्री राजा ने केंद्र एवं झारखंड सरकार के शिक्षा मंत्री से आग्रह किया है कि वे इस मामले में अविलंब संज्ञान लेकर और यथोचित निर्णय करें ताकि संगीत शिक्षकों की समक्ष उत्पन्न भ्रम की स्थिति का निवारण हो सके।

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